chief edittor satish yadav
20/10/2025
दीपावली के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। सनातन संस्कृति का यह पर्व आप सभी के जीवन में सभी प्रकार की खुशियां और आनंद ले कर आए, ऐसी मेरी ईश्वर से कामना है।
मैं आज सुबह से अनेक संदेश देख रहा हूं, सभी संदेशों में यही लिखा है कि प्रकाश पर्व दीपोत्सव। क्या दीपावली केवल प्रकाश और दीपों का ही पर्व है? इसके ऊपर हमें कहीं गहनता से विचार करने की आवश्यकता है। दीपावली हमारी सनातन संस्कृति के महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रकटीकरण है, जो यदि हम आज भी अपने जीवन में अपनाकर रखेंगे तो हम देखेंगे कि हमारा समाज पुन: वही राम राज्य बन सकता है।
यह दीपावली परिणीति है उन 14 वर्षों की जिसका प्रारंभ प्रारंभ माता कैकई द्वारा अपने वचन मांगने से प्रारंभ होता है राजा दशरथ द्वारा दिए गए वचनों का पालन करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने अयोध्या जैसा वैभवशाली साम्राज्य त्याग कर वनवासी होने का व्रत धारण कर लिया। रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई। यह पर्व परिणति है अनुज लक्ष्मण के त्याग का जिन्होंने अपनी पत्नी के साथ को त्याग कर अपने बड़े भाई के साथ वन में जाने का प्रण कर लिया, यह भी न सोचा कि मेरी पत्नी का मेरे पीछे क्या होगा। केवल यही दो भाई नहीं तीसरा भाई जिनकी सगी मां के द्वारा राम को वनवासी होने का आदेश दिया गया था, उन्होंने भी अपनी मां के आदेश को ठुकरा कर आग्रह को ठुकरा कर अपने बड़े भाई, जिनका कि उस सिंहासन पर अधिकार था, उस को त्याग कर उनकी खड़ाऊं को लेकर राज्य को चलाने का प्रण लिया। सबसे छोटा भाई, उसने भी अपने साम्राज्य के सुखों को त्याग कर अपने लिए नगर के बाहर एक छोटी सी कुटिया बनाकर उसमें रहने का निर्णय लिया था।
इससे आगे चलते हैं, वन में जाने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने किस प्रकार से अपने कार्य किए, समाज से वंचित लोगों को जोड़कर, जो उस समय के सर्वोच्च शक्तिशाली साम्राज्य थे उनका दंभ नष्ट किया। चाहे बाली के शासन को समाप्त कर सुग्रीव का शासन स्थापित करना हो, चाहे रावण के अन्य राक्षसों का संहार हो। राम प्रतीक हैं सनातन संस्कृति की समरसता के, जहां वे भीलनी के जूठे बेर खाते हैं तो अपने हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार भी करते हैं।
राम शरणागत वत्सल भी हैं, अपनी शरण में आए विभीषण को अभय दान देकर लंका जैसे वैभव संपन्न राज्य का शासन भी सौंपा। राम एक कुशल योजक भी हैं, रावण जैसे त्रिलोक विजयी शासक को समाप्त करने के लिए नारायणी सेना नहीं बुलाई अपितु गिरवासी, वनवासी, पीड़ित लोगों को संगठित कर अत्याचारी दशानन का अंत किया।
इस प्रकार हमने देखा कि वे 14 वर्ष समाज में अनेक कीर्तिमान स्थापित करते हैं।
हम सभी आज स्वागत करें उन मर्यादा पुरुषोत्तम राम का, योजक राम का, त्याग की मूर्ति राम का, समाजिक समरसता की प्रतिमूर्ति राम का। दिए में जलाएं उन अहंकारों को जो हमें अपनों से दूर करते हैं। पटाखों से खंड खंड कर दें उन स्थापित मूल्यों को जो सत्ता के लिए अपने पिता को बंदी बनाने, अपने भाइयों की हत्या करने के उदाहरण देते हैं।
पुन: मर्यादा पुरुषोत्तम राम का स्वागत करते हुए प्रयास करें कि सनातन संस्कृति दीर्घकाल तक अपने आदर्श स्थापित करती रहे।
धन्यवाद।
