संवाददाता-सतीश यादव
अपने जमाने के मशहूर शायर मीर-तकी-मीर 300 साल पहले जब लखनऊ आए थे, तब यहां की फिजा रंगीन थी. आसमां, आसमानी नहीं था, बल्कि कहीं लाल, कहीं पीला तो कहीं गुलाबी था. जमीं से फलक तक और जहां तक निगाह जाती थी तहां-तहां सिर्फ रंग ही रंग नजर आते थे. मीर साहब की नजरों ने ये देखा तो बोल पड़े…होली खेले असफउद्दौला वज़ीर, रंग सोबत अजब हैं खुरदोपीर कुमकुमे जो मारकर भरकर गुलाल, जिसके लगता आकर फिर मेहंदी लालअसल में शायर मीर साहब ने तब के नवाब रहे आसफ़उद्दौला को यूं खुशदिली से होली मनाते देखा तो पहले तो अचरज में पड़े और फिर उन्होंने अवध की असली रंगत को पहचाना तो उसके कायल हो गए.
बेलौस अंदाज और बेलाग अदा का त्योहार है होलीहोली त्योहार ही ऐसा है. बेलौस अंदाज और बेलाग अदा का त्योहार. आदमी इस दिन हाथ नहीं मिलाता, सीधे गलबहियां करता है. गले मिलने की इस बात के जिक्र पर जोर इसलिए है कि दो मर्दों के बीच गले मिलने वाली एक्टिविटी बहुत आम नहीं है. दो मर्द यूं झट से किसी को गले नहीं लगा लेते हैं, लेकिन होली एक ऐसा मौका होता है, जहां दो मर्द भी बड़ी मोहब्बत के साथ एक-दूसरे के कंधों पर सिर टिकाकर तीन बार गले मिलने की रस्म अदायगी करते हैं. यहां थोड़ा रुककर ईद का भी जिक्र कर लेना चाहिए, जो इसी तरह गले लगने और गले मिलने का त्योहार है.
चर्चा में है ’52 जुमा एक होली’ का बयान होली और ईद की बात करने की जरूरत इसलिए पड़ी कि इस वक्त दोनों का ही मौका है. होली का माहौल बना ही हुआ है और रमजान के तीस रोज बाद ईद भी आएगी, लेकिन चर्चा में है एक बयान, जिसमें कहा गया कि ‘जुमा साल में 52 बार आता है और होली एक दिन.’ इस बात के क्या मायने हैं और इसे लेकर किसने क्या कहा? इन सवालों के जवाब नहीं तलाशने हैं, बल्कि इस बहाने याद आ गए हैं वो किस्से जिन्होंने होली की यादों को और रंगीन बना दिया है.